भगवद्गीता अध्याय 1 – भाग 5 (श्लोक 41 से 47)
श्लोक और अर्थ सुनें
इस भाग में हम भगवद्गीता के प्रथम अध्याय के श्लोक 41–47 का अध्ययन करेंगे।
इन श्लोकों में अर्जुन अपनी गहन सामाजिक, नैतिक और आत्मिक चिंता व्यक्त करते हैं
और युद्ध के परिणामों पर प्रश्न उठाते हैं।
अध्याय 1 • श्लोक 41
अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः ।
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ 41 ॥
स्त्रीषु दुष्टासु वार्ष्णेय जायते वर्णसंकरः ॥ 41 ॥
अर्थ:
हे कृष्ण! अधर्म के प्रबल होने से कुल की महिलाएँ दूषित हो जाती हैं, और जब महिलाएँ दूषित हो जाती हैं, तब हे वृष्णेय! वर्णसंकर (अशुद्ध संतति) उत्पन्न होता है।
हे कृष्ण! अधर्म के प्रबल होने से कुल की महिलाएँ दूषित हो जाती हैं, और जब महिलाएँ दूषित हो जाती हैं, तब हे वृष्णेय! वर्णसंकर (अशुद्ध संतति) उत्पन्न होता है।
अध्याय 1 • श्लोक 42
सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च ।
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ 42 ॥
पतन्ति पितरो ह्येषां लुप्तपिण्डोदकक्रियाः ॥ 42 ॥
अर्थ:
अवांछित संतानों के वृद्धि के परिणाम स्वरूप, कुलघ्नों और कुल के लिये निश्चय ही नरक जैसा जीवन उत्पन्न होता है। उन कुलघ्नों के पितरों को श्राद्ध‑तर्पण (पिण्ड‑जल) नहीं मिलने से भी पतन होता है।
अवांछित संतानों के वृद्धि के परिणाम स्वरूप, कुलघ्नों और कुल के लिये निश्चय ही नरक जैसा जीवन उत्पन्न होता है। उन कुलघ्नों के पितरों को श्राद्ध‑तर्पण (पिण्ड‑जल) नहीं मिलने से भी पतन होता है।
अध्याय 1 • श्लोक 43
दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसंकरकारकैः ।
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ 43 ॥
उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ॥ 43 ॥
अर्थ:
उन कुलघ्नों की कृत्यों से जो वर्णसंकर उत्पन्न करते हैं, जाति‑धर्म और कुल‑धर्म — जो सनातन हैं — वे नष्ट हो जाते हैं।
उन कुलघ्नों की कृत्यों से जो वर्णसंकर उत्पन्न करते हैं, जाति‑धर्म और कुल‑धर्म — जो सनातन हैं — वे नष्ट हो जाते हैं।
अध्याय 1 • श्लोक 44
उत्सन्नकुलधर्माणां मनुष्याणां जनार्दन ।
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ 44 ॥
नरकेऽनियतं वासो भवतीत्यनुशुश्रुम ॥ 44 ॥
अर्थ:
हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुल‑धर्म नष्ट हो गए हैं, उनके लिये निरन्तर नरक में वास होता है।
हे जनार्दन! जिन मनुष्यों के कुल‑धर्म नष्ट हो गए हैं, उनके लिये निरन्तर नरक में वास होता है।
अध्याय 1 • श्लोक 45
अहो बत महत्पापं कर्तुं व्यवसिता वयम् ।
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ 45 ॥
यद्राज्यसुखलोभेन हन्तुं स्वजनमुद्यताः ॥ 45 ॥
अर्थ:
यह कितनी बड़ी बात है कि हम लोग राज्य और सुख के लोभ से अपनी ही स्वजनों को मारने की ओर अग्रसर हैं — इतना महापाप करने को तैयार!
यह कितनी बड़ी बात है कि हम लोग राज्य और सुख के लोभ से अपनी ही स्वजनों को मारने की ओर अग्रसर हैं — इतना महापाप करने को तैयार!
अध्याय 1 • श्लोक 46
यदि मामप्रतीकारमशस्त्रं शस्त्रपाणयः ।
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ 46 ॥
धार्तराष्ट्रा रणे हन्युस्तन्मे क्षेमतरं भवेत् ॥ 46 ॥
अर्थ:
यदि धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में हथियार लिए मुझे निहत्था और प्रतिकार न करते हुए मार डालें, तो भी मेरे लिये वह मृत्यु अधिक शुभ होगी।
यदि धृतराष्ट्र के पुत्र युद्ध में हथियार लिए मुझे निहत्था और प्रतिकार न करते हुए मार डालें, तो भी मेरे लिये वह मृत्यु अधिक शुभ होगी।
अध्याय 1 • श्लोक 47
संजय उवाच ।
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ 47 ॥
एवमुक्त्वार्जुनः सङ्ख्ये रथोपस्थ उपाविशत् ।
विसृज्य सशरं चापं शोकसंविग्नमानसः ॥ 47 ॥
अर्थ:
संजय ने कहा — इस प्रकार बोलकर अर्जुन युद्धभूमि के बीच रथ पर बैठ गया, धनुष‑बाण त्यागकर, दुःख और व्याकुलता से ग्रस्त मनः।
संजय ने कहा — इस प्रकार बोलकर अर्जुन युद्धभूमि के बीच रथ पर बैठ गया, धनुष‑बाण त्यागकर, दुःख और व्याकुलता से ग्रस्त मनः।
अध्याय 1 • उपसंहार
ॐ तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासूपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे
कृष्णार्जुनसंवादे धर्मकर्मयुद्धयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥
कृष्णार्जुनसंवादे धर्मकर्मयुद्धयोगो नाम प्रथमोऽध्यायः॥
अर्थ:
यह श्लोक भगवद्गीता के प्रथम अध्याय की संक्षिप्त उपसंहार रूपी उद्घोषणा है। इसमें कहा गया है कि यह अध्याय धर्म, कर्म और युद्ध के योग का परिचय देता है, जिसमें कृष्ण और अर्जुन का संवाद प्रस्तुत है।
यह श्लोक भगवद्गीता के प्रथम अध्याय की संक्षिप्त उपसंहार रूपी उद्घोषणा है। इसमें कहा गया है कि यह अध्याय धर्म, कर्म और युद्ध के योग का परिचय देता है, जिसमें कृष्ण और अर्जुन का संवाद प्रस्तुत है।


