श्रीमद्भगवद्गीता अध्याय 2 – भाग 3 (श्लोक 21 से 30)
श्लोक और अर्थ सुनें
इस भाग में भगवान श्रीकृष्ण आत्मा की अविनाशी प्रकृति और शरीर की नश्वरता का गहन ज्ञान देते हैं।
वे बताते हैं कि आत्मा को कोई शस्त्र काट नहीं सकता, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
मृत्यु केवल शरीर का परिवर्तन है, आत्मा का नहीं। इसलिए ज्ञानी व्यक्ति मृत्यु पर शोक नहीं करता।
अध्याय 2 • श्लोक 21
वेदाविनाशिनं नित्यं य एनमजमव्ययम् ।
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ 21 ॥
कथं स पुरुषः पार्थ कं घातयति हन्ति कम् ॥ 21 ॥
अर्थ:
हे अर्जुन! जो व्यक्ति आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या किसी को मरवा सकता है?
हे अर्जुन! जो व्यक्ति आत्मा को अविनाशी, नित्य, अजन्मा और अव्यय जानता है, वह कैसे किसी को मार सकता है या किसी को मरवा सकता है?
अध्याय 2 • श्लोक 22
वासांसि जीर्णानि यथा विहाय
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ 22 ॥
नवानि गृह्णाति नरोऽपराणि ।
तथा शरीराणि विहाय जीर्णा
न्यन्यानि संयाति नवानि देही ॥ 22 ॥
अर्थ:
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है।
जैसे मनुष्य पुराने वस्त्रों को त्यागकर नए वस्त्र धारण करता है, वैसे ही आत्मा पुराने शरीर को त्यागकर नया शरीर धारण करती है।
अध्याय 2 • श्लोक 23
नैनं छिन्दन्ति शस्त्राणि नैनं दहति पावकः ।
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ 23 ॥
न चैनं क्लेदयन्त्यापो न शोषयति मारुतः ॥ 23 ॥
अर्थ:
आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
आत्मा को शस्त्र काट नहीं सकते, अग्नि जला नहीं सकती, जल भिगो नहीं सकता और वायु सुखा नहीं सकती।
अध्याय 2 • श्लोक 24
अच्छेद्योऽयमदाह्योऽयमक्लेद्योऽशोष्य एव च ।
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ 24 ॥
नित्यः सर्वगतः स्थाणुरचलोऽयं सनातनः ॥ 24 ॥
अर्थ:
आत्मा न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है, न भिगोई जा सकती है और न सुखाई जा सकती है। यह नित्य, सर्वव्यापी, अचल और सनातन है।
आत्मा न काटी जा सकती है, न जलाई जा सकती है, न भिगोई जा सकती है और न सुखाई जा सकती है। यह नित्य, सर्वव्यापी, अचल और सनातन है।
अध्याय 2 • श्लोक 25
अव्यक्तोऽयमचिन्त्योऽयमविकार्योऽयमुच्यते ।
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ 25 ॥
तस्मादेवं विदित्वैनं नानुशोचितुमर्हसि ॥ 25 ॥
अर्थ:
आत्मा अदृश्य, अचिन्त्य और अविकार है। इसे जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
आत्मा अदृश्य, अचिन्त्य और अविकार है। इसे जानकर तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
अध्याय 2 • श्लोक 26
अथ चैनं नित्यजातं नित्यं वा मन्यसे मृतम् ।
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ 26 ॥
तथापि त्वं महाबाहो नैवं शोचितुमर्हसि ॥ 26 ॥
अर्थ:
यदि तुम आत्मा को बार-बार जन्म लेने और मरने वाला भी मानो, तब भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
यदि तुम आत्मा को बार-बार जन्म लेने और मरने वाला भी मानो, तब भी तुम्हें शोक नहीं करना चाहिए।
अध्याय 2 • श्लोक 27
जातस्य हि ध्रुवो मृत्युर्ध्रुवं जन्म मृतस्य च ।
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 27 ॥
तस्मादपरिहार्येऽर्थे न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 27 ॥
अर्थ:
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म भी निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य सत्य पर शोक नहीं करना चाहिए।
जिसका जन्म हुआ है उसकी मृत्यु निश्चित है, और जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म भी निश्चित है। इसलिए इस अपरिहार्य सत्य पर शोक नहीं करना चाहिए।
अध्याय 2 • श्लोक 28
अव्यक्तादीनि भूतानि व्यक्तमध्यानि भारत ।
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ 28 ॥
अव्यक्तनिधनान्येव तत्र का परिदेवना ॥ 28 ॥
अर्थ:
सभी प्राणी जन्म से पहले अदृश्य थे, जन्म के बाद दिखाई देते हैं और मृत्यु के बाद फिर अदृश्य हो जाते हैं। इसलिए शोक का कोई कारण नहीं है।
सभी प्राणी जन्म से पहले अदृश्य थे, जन्म के बाद दिखाई देते हैं और मृत्यु के बाद फिर अदृश्य हो जाते हैं। इसलिए शोक का कोई कारण नहीं है।
अध्याय 2 • श्लोक 29
आश्चर्यवत्पश्यति कश्चिदेनम्
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 29 ॥
आश्चर्यवद्वदति तथैव चान्यः ।
आश्चर्यवच्चैनमन्यः शृणोति
श्रुत्वाप्येनं वेद न चैव कश्चित् ॥ 29 ॥
अर्थ:
कोई आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह बताता है, कोई आश्चर्य की तरह सुनता है, फिर भी कोई इसे पूर्ण रूप से नहीं समझ पाता।
कोई आत्मा को आश्चर्य की तरह देखता है, कोई आश्चर्य की तरह बताता है, कोई आश्चर्य की तरह सुनता है, फिर भी कोई इसे पूर्ण रूप से नहीं समझ पाता।
अध्याय 2 • श्लोक 30
देही नित्यमवध्योऽयं देहे सर्वस्य भारत ।
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 30 ॥
तस्मात्सर्वाणि भूतानि न त्वं शोचितुमर्हसि ॥ 30 ॥
अर्थ:
हे अर्जुन! आत्मा सभी शरीरों में नित्य और अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।
हे अर्जुन! आत्मा सभी शरीरों में नित्य और अवध्य है। इसलिए तुम्हें किसी भी प्राणी के लिए शोक नहीं करना चाहिए।


